नेपाल के साथ सीमा विवाद पर भारत का स्पष्ट रुख, तीसरे पक्ष की भूमिका से किया इनकार

Dheeraj Vishwakarma
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नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah (बालेन शाह) के हालिया बयान के बाद भारत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। भारत ने कहा है कि भारत-नेपाल सीमा विवाद एक द्विपक्षीय मामला है। इसके समाधान में किसी तीसरे देश या अंतरराष्ट्रीय संस्था की कोई भूमिका नहीं हो सकती।

यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल के प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि सीमा विवाद के समाधान के लिए ब्रिटेन और चीन भागीदारी करें। भारत ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज किया। भारत ने कहा कि दोनों देशों के बीच पहले से स्थापित द्विपक्षीय तंत्र हैं और उन्हीं के माध्यम से सभी विवादों का समाधान किया जाएगा।


आखिर क्या है पूरा मामला?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने हाल ही में नेपाल की संसद में कहा था कि भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल द्वारा भी कुछ स्थानों पर भारतीय क्षेत्र का उपयोग या अतिक्रमण किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि सीमा विवाद के ऐतिहासिक कारणों को देखते हुए ब्रिटेन को भी इस प्रक्रिया में रुचि लेनी चाहिए क्योंकि वर्तमान सीमा की नींव 1816 की सुगौली संधि के दौरान रखी गई थी।

प्रधानमंत्री शाह के इस बयान के बाद नेपाल की राजनीति में भी बड़ा विवाद खड़ा हो गया। कई विपक्षी दलों और सीमा विशेषज्ञों ने उनके बयान की आलोचना की और कहा कि इससे नेपाल के पारंपरिक दावों की स्थिति कमजोर हो सकती है। नेपाल की संसद में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला।


भारत ने क्या कहा?

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

“भारत और नेपाल के बीच सीमा संबंधी सभी मुद्दों को सुलझाने के लिए द्विपक्षीय तंत्र पहले से मौजूद हैं। यह एक द्विपक्षीय मामला है और इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।”

विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा पहले ही निर्धारित और चिह्नित किया जा चुका है। केवल कुछ हिस्सों में तकनीकी और भौगोलिक कारणों से विवाद बना हुआ है।


किन क्षेत्रों को लेकर है विवाद?

भारत और नेपाल के बीच मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों को लेकर विवाद है:

1. कालापानी (Kalapani)

2. लिपुलेख (Lipulekh)

3. लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura)

इन क्षेत्रों पर दोनों देश अपना दावा करते हैं। भारत का कहना है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड राज्य का हिस्सा हैं, जबकि नेपाल इन्हें अपने क्षेत्र का भाग मानता है।

इसके अलावा बिहार और नेपाल सीमा पर स्थित सुस्ता (Susta) क्षेत्र भी लंबे समय से विवादित रहा है। नदी के मार्ग बदलने और सीमा स्तंभों की स्थिति बदलने के कारण यहां समय-समय पर विवाद पैदा होते रहे हैं।


विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत-नेपाल सीमा का आधार 1816 की सुगौली संधि (Treaty of Sugauli) को माना जाता है, जो ब्रिटिश भारत और नेपाल के बीच हुई थी।

समस्या इस बात को लेकर है कि संधि में उल्लेखित काली नदी (Mahakali River) का वास्तविक स्रोत कौन-सा है। दोनों देशों की व्याख्याएं अलग-अलग हैं, जिसके कारण सीमा निर्धारण को लेकर विवाद पैदा हुआ।

2020 में यह विवाद तब और बढ़ गया था जब भारत ने लिपुलेख तक एक सड़क का उद्घाटन किया। इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया था।


नेपाल में क्यों मचा राजनीतिक बवाल?

प्रधानमंत्री बालेन शाह के बयान के बाद नेपाल में कई राजनीतिक दलों ने विरोध जताया। विपक्ष का आरोप है कि उनके बयान से नेपाल की सीमा संबंधी स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

नेपाल की संसद में कई सांसदों ने प्रधानमंत्री से माफी मांगने और उनके बयान को रिकॉर्ड से हटाने की मांग की। सीमा विशेषज्ञों ने भी कहा कि सीमा पर भूमि उपयोग और वास्तविक क्षेत्रीय दावे दो अलग-अलग विषय हैं, जिन्हें मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी ने प्रधानमंत्री का बचाव करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य सीमा विवाद को तेजी से सुलझाने के लिए व्यापक चर्चा को बढ़ावा देना था।


भारत के लिए यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंध बेहद मजबूत हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा के आवाजाही कर सकते हैं।

यही कारण है कि सीमा विवाद को संवेदनशील मुद्दा माना जाता है। भारत हमेशा से इस मामले को आपसी बातचीत के जरिए सुलझाने की नीति पर जोर देता रहा है।


आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत बढ़ सकती है।

संभावित कदम:

  • संयुक्त सीमा सर्वेक्षण
  • विवादित क्षेत्रों की तकनीकी जांच
  • सीमा स्तंभों का पुनः सत्यापन
  • द्विपक्षीय वार्ताओं का नया दौर
  • राजनीतिक स्तर पर विश्वास बहाली

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि बातचीत का रास्ता खुला है, लेकिन किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी।


निष्कर्ष

भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद नया नहीं है, लेकिन हालिया बयानों ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के बयान और तीसरे पक्ष को शामिल करने के सुझाव के बाद भारत ने दो टूक शब्दों में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि सीमा विवाद केवल भारत और नेपाल के बीच का विषय है।

दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का समाधान भी आपसी विश्वास और संवाद के माध्यम से ही संभव है। फिलहाल नई दिल्ली का संदेश साफ है—“सीमा विवाद का समाधान द्विपक्षीय वार्ता से होगा, किसी तीसरे पक्ष से नहीं।”

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