
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड Central Board of Secondary Education (CBSE) में चल रहा On-Screen Marking (OSM) विवाद अब केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब राजनीतिक रंग ले चुका है और केंद्र सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
2 जून 2026 को केंद्र सरकार द्वारा CBSE चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला किए जाने के बाद विपक्ष ने इस कार्रवाई को “अपर्याप्त” बताते हुए सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वहीं सरकार का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं।
आखिर क्या है OSM विवाद?
CBSE ने इस वर्ष 12वीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए डिजिटल On-Screen Marking (OSM) प्रणाली लागू की थी। इस प्रणाली के तहत परीक्षक स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं की जांच ऑनलाइन करते हैं।
लेकिन परिणाम जारी होने के बाद बड़ी संख्या में छात्रों ने मूल्यांकन में गड़बड़ियों, तकनीकी खामियों और री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया में समस्याओं की शिकायत की। कई छात्रों ने दावा किया कि उनके प्राप्त अंक उनकी अपेक्षा से काफी कम हैं और मूल्यांकन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही।
विपक्ष ने सरकार को घेरा

सरकार द्वारा अधिकारियों के तबादले के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan पर हमला बोल दिया।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि केवल अधिकारियों का तबादला करके सरकार जनता की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि यदि OSM प्रणाली में इतनी बड़ी खामियां थीं तो इसकी जवाबदेही केवल बोर्ड अधिकारियों की नहीं बल्कि उच्च स्तर पर भी तय होनी चाहिए।
विपक्ष ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े इतने गंभीर मामले में केवल प्रशासनिक फेरबदल पर्याप्त नहीं है।
राहुल गांधी ने भी उठाए सवाल
लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है। उन्होंने उस छात्र से मुलाकात भी की जिसने OSM प्रणाली से जुड़ी कथित अनियमितताओं और तकनीकी खामियों को सार्वजनिक रूप से उजागर किया था।
राहुल गांधी ने कहा कि जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने इस मामले में तेजी से कार्रवाई करते हुए जांच समिति का गठन किया है। साथ ही नए चेयरमैन और सचिव की नियुक्ति भी कर दी गई है ताकि बोर्ड का कामकाज प्रभावित न हो।
सरकार का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। OSM सेवाओं की खरीद प्रक्रिया और उसके कार्यान्वयन दोनों की समीक्षा की जा रही है।
छात्रों के बीच बढ़ी चिंता
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे अधिक प्रभावित छात्र और अभिभावक हैं। उनकी चिंता यह है कि यदि मूल्यांकन प्रणाली में वास्तव में खामियां थीं तो क्या उनके परिणाम सही हैं? क्या पुनर्मूल्यांकन से उन्हें न्याय मिलेगा? और क्या भविष्य में ऐसी समस्याएं दोबारा नहीं होंगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर राजनीति से अधिक ध्यान समाधान पर होना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है।
क्या हो सकता है समाधान?
1. स्वतंत्र न्यायिक या विशेषज्ञ जांच
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति से कराई जाए।
2. मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाएं सार्वजनिक हों
छात्रों को अपनी जांची गई उत्तर पुस्तिकाएं आसानी से देखने की सुविधा मिले।
3. तकनीकी ऑडिट कराया जाए
OSM प्रणाली की तकनीकी जांच किसी स्वतंत्र साइबर और शिक्षा विशेषज्ञ संस्था से कराई जाए।
4. जवाबदेही तय हो
यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही साबित होती है तो संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों पर कार्रवाई हो।
5. छात्र हित सर्वोपरि रहे
राजनीतिक बहस से ऊपर उठकर छात्रों की समस्याओं का त्वरित समाधान किया जाए।
निष्कर्ष
CBSE OSM विवाद अब केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है। एक ओर विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, तो दूसरी ओर सरकार जांच के जरिए सच्चाई सामने लाने की बात कर रही है। लेकिन इस पूरे विवाद के केंद्र में देश के लाखों छात्र हैं, जिनकी मेहनत और भविष्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और सरकार की आगे की कार्रवाई तय करेगी कि यह विवाद शिक्षा सुधार का अवसर बनता है या केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रह जाता है।


